Friday, May 11, 2018









जब कुछ धातु  की सतह पर उचित आवृति  का विकिरण डाला जाता है तो धातु सतह से इलेक्ट्रान उत्सृजित  होने लागते है  इस प्रभाव  को प्रकाश विदुत  प्रभाव  कहते है  जब उत्सृजित  इलेक्ट्रोनो   धन  विभव पर रखी गयी प्लेट के  द्वारा  आकर्षित  कराया जाता है  तो परिपथ में धारा  बहने लगती है इस प्रकार  की बहने वाली  धारा  को प्रकाश विद्युत धारा  कहते है  वास्तव में प्रकाश विद्युत प्रभाव में प्रलाश ऊर्जा का विदुत  ऊर्जा में रूपान्तरण  होता है
                               प्रकाश विसृत  प्रभाव  का अध्ययन  सर्वप्रथम  हर्ट्ज  नाम के वैज्ञानिक  ने 1887 में किया था उन्होंने पाया की विदुत  विसर्जन  नलिका  में विसर्जन  की प्रक्रिया  आसान  हो जाती है  यदि कैथोड  पर परबैगनी प्रकश डाला जाये  सन  1888 में  हाल्वेश  नाम के वैज्ञानिक ने एक प्रयोग के द्वारा  इस प्रभाव  की   पुस्टि  की
                   प्रयोग में एक अत्यंत  सरल उपकरण उपयोग में लाया जाता है  इसमें क्वार्ट्ज़  की एक निर्वतित नलिका होती है  जिसके भीतर  ज़िंक की दो प्लेट C तथा  A लगी हुई  होती है   C का सम्बन्ध  एक बैटरी B  के ऋण  धुव  तथा  A  संबंध  बैटरी की धन  धुव  से कर दिया जाता है परिपथ में बहने वाले धारा  को देखने  के लिए ेल सुगढ़ी धारामापी  भी  परिपथ की श्रेणीक्रम  में जोड़ दिया जाता है जब पराबैंगनी  किरणे  प्लेट  C पर आपतित  होता है  तो परिपथ    धारा  बहने लगती है और धारामापी की सुई  विछेपित  हो जाती है जब पड़ने वाले प्रकाश  को हटा लिया जाता है तो धारा  प्रवाह  बंद हो जाता है





 इस प्रयोग की परिणाम इस तथ्य को सिद्ध करते है की जब जस्ते की प्लेट पर प्रकाश पड़ता है तो   उससे इलेक्ट्रान  उत्सृजित  होते है जो परिपथ में बहने वाली धारा  की लिये  उतरदायी    होते है
               

                                     

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